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बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु- सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु ! कविता, कवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” जी द्वारा लिखी गई प्रचलित कविताओं में से एक है | मैं व्यक्तिगत रूप से इस कविता को बहुत पसंद करता हूँ | हर कवि की एक अद्भुत सोच होती है और अद्भुत कल्पनाशीलता होती हैं| यह कविता एक अलग विचार और भावना से भरी हुई है | अगर आप श्री सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” निराला जी को पढ़ो तो उनकी रचनाएं कभी भारत के युवा को जागृत कर रही हैं तो कभी , देश की दशा से परिचय करा रही हैं ….

इस कविता में निराला जी नाविक से कहतें हैं , नाव को मत बांधो अर्थात मुक्त रखो अगर आप ऐसा करोगे तो समस्त ग्रामवासी इस विषय पर आपसे प्रश्न करेगा | कवि नाविक से कहता है कि यह वही घाट है जहाँ पर वह स्नान किया किया करती थी ,उस अवस्था में जो भी उसे देखता था , ध्यानमग्न हो जाता था उसे ही टकटकी लगाये देखता रहता था|

अब यह कविता प्रस्तुत है आपके समक्ष कृपया पढ़ें और अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को साझा करें …

“.. बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु ..”

बाँधो न नाव- इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा-सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे, दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी, सबके दाँव, बंधु!

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

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